इतिहास कहता है, "मानव जाति और अस्त्र शस्त्रों का बड़ा ही निकट संबंध रहा है।

इतिहास कहता है, “मानव जाति और अस्त्र शस्त्रों का बड़ा ही निकट संबंध रहा है।

इतिहास का तो प्रयोजन ही यही है, कि वो हमें वर्तमान निर्मित होने की कथा सुनाए!

इतिहास कहता है, “मानव जाति और अस्त्र शस्त्रों का बड़ा ही निकट संबंध रहा है।”

“अस्त्र” अर्थात् फेंक कर प्रहार किए जाने वाले आयुध।

और “शस्त्र” के मायने हाथ में लेकर ही प्रयोग किये जाने वाले आयुधों से है।

प्रौगेतिहासिक मानव ने अस्त्र शस्त्र का प्रयोग “एज़ ऐन ऑब्स्टेकल” किया है। शिकार की गति रोकने हेतु, शक्ति क्षीण करने हेतु।

विकास का क्रम देखें तो पहले “शस्त्र” आये होंगे। किन्तु जल्दी ही मनुजों ने ये जान लिया कि शिकार के निकट जाना उचित नहीं, आवश्यक नहीं। अतः इस प्रेरणा से “अस्त्र” बने।

पाषाण युग कब का बीत गया, कुछ “शांतिप्रिय” जन आज भी “पत्थरबाज़ी” में रुचि लेते हैं।

खैर, अब हम “दिव्यास्त्रों” की ओर चलते हैं।

यों तो कोई भी अस्त्र-शस्त्र “दिव्यता” को प्राप्त कर सकता है। किंतु “दिव्यास्त्र” का बहुधा प्रयोग “बाणों” के लिए किया जाता है।

“धनुष” शस्त्र है, हाथ में रहता है सदैव।
“बाण” अस्त्र है, हाथ से दूर फेंका जाता है।

“बाण” का संस्कृत रूप है “शर”। धातु “शृ”, जिसका परिप्रेक्ष्य है चीड़-फाड़ करना।

“शृ” है, “सृ”नहीं। उस “सृ” का का अर्थ है भिन्न है। “चरक” और “सुश्रुत” की “शल्य” क्रिया के पार्श्व में भी “शृ” धातु ही है।

कदाचित् ही कोई ऐसा हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ हो, जिसमें अस्त्र-शस्त्र का उल्लेख न मिले। बल्के, हर ग्रन्थ का में कोई एक या दो अस्त्र “अतिप्रभावी” होते हैं।

वाल्मीकीय “रामायण” में “ऐन्द्रास्त्र” की तुलना “ब्रह्मदण्ड” से की गयी है। अर्थात् इसकी विनाशक गति उतनी ही है, जितनी कि ब्रह्मा की सृजन गति!

“महाभारत” में अगणित अस्त्रों का उल्लेख है। यथा : “पाशुपतास्त्र”।

“पाशुपत” शब्द आया है “पशुपति” से। अर्थात् समस्त “पशुओं” के स्वामी। उक्त तीनों शब्द भी “आयुध” कोश से ही हैं!

विकास के क्रम में पहले “शस्त्र” फिर “अस्त्र” बने।

कालांतर में मानव ने ये जान लिया कि न केवल “शस्त्र” और न ही केवल “अस्त्र” बल्के वृक्षों की छालों और शाखाओं को आपस में मींज कर बनी रस्सियों से भी “आयुध” का काम लिया जा सकता है।

इन्हें नाम मिला “पाश”। और जो “पाश” से बाँधा जा सके, वो “पशु”। वैदिक मानव ने स्वयं को भी “पाश” में बांधे जा सकने की संभावनाओं के चलते, “पशु” ही माना खुद को।

समस्त “पशुओं” के स्वामी का “अस्त्र”, सबसे अधिक दुर्लभ, सर्वाधिक दुर्दांत!

हिन्दू समाज में “पशुपति” शिव को माना गया है। “नेपाल” में इस नाम से मंदिर भी है उनका। समस्त “आयुध” शास्त्र और युद्ध विज्ञान के जनक, वे ही माने जाते हैं।

सहज प्रश्न उठता है, वास्तव में “पाशुपतास्त्र” क्या है?

मैं कहूँगा : “इट्स नॉट अ सिंगल वेपन, व्हाइल फिनोमिना इटसेल्फ!”

[ कोई अकेला अस्त्र नहीं है ये, बल्कि अस्त्र विज्ञान का भौतिक सिद्धांत है। ]

कैसे?

महाभारत के दो आख्यान इस निहित रहस्य का उद्घाटन करते हैं।

पहला है, अर्जुन द्वारा “शिव” से “पाशुपतास्त्र” की प्रार्थना करना। और दूसरा है, महाभारत युद्ध में अर्जुन के रथ की गति।

जब अर्जुन ने “शिव” से अस्त्र माँगा तो ये नहीं कहा कि मुझे अस्त्र दीजिये, बल्कि कहा : “उपसंगम्य विश्वेशम्” अर्थात् “मुझे उपदेश दीजिये”।

इस प्रसंग के पश्चात् “वेदव्यास” लिखते हैं : “रहस्यनिवर्तनम्” अर्थात् “शिव ने रहस्य बताया”।

कुलमिला कर लब्बोलुआब ये है कि कोई “भौतिक” रूप “बाण” नहीं था “पाशुपतास्त्र” बल्कि ये “ज्ञान” था!

“शिव” ने भी ये नहीं कहा कि ये अस्त्र किसी ने पास नहीं है, बल्कि उनके शब्दशः वचन हैं : “इसे कोई नहीं जानता!”

शिव ने कहा है : “नैतद् वेद महेन्द्रोsपि!”

उन्होंने “वेद” शब्द का प्रयोग किया है। “विद्” धातु, जिसके मायने हैं “जानने” के सन्दर्भ में!

इस प्रसङ्ग के उपरान्त “वेदव्यास” लिखते हैं : “रहस्यनिवर्तनम्” अर्थात् “शिव ने रहस्य बताया”।

कुलमिला कर लब्बोलुआब ये है कि कोई “भौतिक” रूप “बाण” नहीं था “पाशुपतास्त्र” बल्कि ज्ञान था!

कैसा ज्ञान?

ये स्पष्ट होता है, दूसरे प्रसङ्ग से, महाभारत युद्ध में अर्जुन के रथ की गति से!

वेदव्यास जी कहते हैं, अर्जुन का बाण एक कोस पर गिरता था। वर्तमान तीन से चार किमी के मध्य। अर्जुन से लगभग इतनी दूरी, एक सामान्य सैन्य टुकड़ी बना कर रखती थी।

और अर्जुन का सटीक लक्ष्य भेद दो मील का था। वर्तमान तीन किमी। उनके बराबर के योद्धा, उनसे दो मील दूर से युद्ध करते थे।

विचार कीजिये, अर्जुन के बाण को सम्मुख योद्धा तक पहुंचने में कितना समय लगता होगा?

उतने ही समय में सम्मुख उपस्थित योद्धा को आ रहे अस्त्र का काट ढूंढना होता होगा!

पंद्रह सेकण्ड लगेंगे, यदि दो सौ मीटर प्रति सेकण्ड की गति से बाण फेंका जा सके। यही गति तीन सौ हो जाए तो दस सेकण्ड।

तीन सौ मीटर प्रति सेकण्ड, ब्यूटीफुल स्पीड। केवल इकतालीस मीटर कम, ध्वनि की गति से!

वेदव्यास कहते हैं, अर्जुन की बाणवर्षा के बाण लक्षित भूमि बाद में गिरते थे, उससे पूर्व उनका रथ वहां पहुंच जाता था।

अर्थात् श्रीकृष्ण की रथ चलाने की गति सुपर-सोनिक थी। ध्वनि की गति से भी तीव्र।

वास्तव में, “दिव्यास्त्र” वे अस्त्र माने जाते थे, जो उनके रथ पहुँचने से पूर्व ही लक्ष्य भेद कर दें।

सरल भाषा में कहें तो “सुपर-सोनिक” बाण को ही “दिव्यास्त्र” कहा जाएगा। और वो ध्वनि की गति से कितना अधिक गति लिए है, ये मानक उसका स्तर निश्चित करेगा।

बाण के नोंक पर वृक्षों के पत्तों का लेप लागाया जाता था, ताकि वे रात्रि प्रवास में चमकें नहीं। और जब वे दिन के प्रकाश में सुपर-सोनिक गति से चलते, तो उत्पन्न घर्षण में कारण फलक पर लगा क्लोरोफिल ऑक्सीजन से अभिक्रिया कर तीव्र चमक के साथ जल उठता था।

इस चमक अर्थात् “द्युति” के कारण, इन बाणों का संबंध “देवताओं” से माना जाने लगा। और ये “दिव्यास्त्र” कहलाये।

इति दिव्यास्त्र:।

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सम्पादक :- मध्यभारत live न्यूज़

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