क्यों शरद पूर्णिमा को उत्सव के रूप में मनाया जाता है, क्या है पौराणिक कथा ?

क्यों शरद पूर्णिमा को उत्सव के रूप में मनाया जाता है, क्या है पौराणिक कथा ?

धार :-  शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा हमारी धरती के बहुत ही करीब होता है, इसलिए चंद्रमा के प्रकाश में मौजूद रासायनिक तत्व सीधे-सीधे धरती पर गिरते हैं | 

शरद पूर्णिमा को मनाने के क्या कारण हैं ?

      आश्चिन (कुँवार ) मांस के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा शरद पूर्णिमा के रूप में मनाई जाती है, शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहा जाता है |  तथा कुछ क्षेत्रों में इस व्रत को कौमुदी व्रत भी कहा जाता है, शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा व भगवान विष्णु का पूजन कर व्रत कथा पढ़ी जाती है, धर्म ग्रंथों के अनुसार इसी दिन चंद्र अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होते हैं, मान्यता है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचा था, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा हमारी धरती के बहुत करीब होता है, इसलिए चंद्रमा के प्रकाश में मौजूद रासायनिक तत्व सीधे-सीधे धरती पर गिरते हैं, खाने पीने की चीजे खुले आसमान के नीचे रखने से चंद्रमा की किरणें सीधी उन पर पड़ती है, यह दिन मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए मनाया जाता है, और पूरी रात जागरण करने के पश्चात ही  देवी लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है | 

पौराणिक कथा के अनुसार—

      एक कथा अनुसार एक साहूकार के यहाँ दो पुत्रियां थी, दोनों पुत्रियां पूर्णिमा का व्रत रखती थी, लेकिन बड़ी पुत्री पूर्ण व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधूरा व्रत करती थी, इसका परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की संतान पैदा होते ही मर जाती थी, उसने पंडितों से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी, जिसके कारण तुम्हारी संतान पैदा होते ही मर जाती हैं, पूर्णिमा का व्रत विधि पूर्वक करने से तुम्हारी संतान जीवित रह सकती है, उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधि पूर्वक किया बाद में उसे एक लड़का पैदा हुआ जो कुछ दिनों बाद ही फिर से मर गया, उसने लड़के को एक पाटा (पटिया ) पर लेटा कर ऊपर से कपड़ा ढक दिया फिर बड़ी बहन को बुला कर लाई और उसे बैठने के लिए वही पाटा दे दिया बड़ी बहन जब उस पर बैठने लगी तो उसका लहंगा बच्चे को छूते ही रोने लगा, तब बड़ी बहन ने कहा कि तुम मुझे कलंक लगाना चाहती थी, मेरे बैठने से ये मर जाता तो, तब छोटी बहन बोली कि ये तो पहले से ही मरा हुआ था, तेरे ही भाग्य से यह जीवित हुवा है, उसके बाद नगर में उसने पूर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया तब से यह दिन एक उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा | 

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सम्पादक :- मध्यभारत live न्यूज़

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