हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने माना सही

इंदौर। भले ही आपने वाहन बेचने के बाद स्टाम्प पर लिखा-पढ़ी कर दी हो, लेकिन एक्सीडेंट होने पर आप थर्ड पार्टी क्लेम की जिम्मेदारी से तब तक नहीं बच सकते जब तक आप अपना नाम आरटीओ रिकॉर्ड से नहीं हटवा लेते। अक्सर होता है कि गाड़ी बेचने वाला व्यक्ति फॉर्म 29-30 पर साइन कर निश्चित हो जाता है। वह मानकर चलता है कि एक्सीडेंट होने पर उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी, लेकिन ऐसा है नहीं। हाल ही में आए सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने इस संबंध में स्थिति स्पष्ट कर दी है। कोर्ट ने फैसले में कहा है कि जब तक गाड़ी बेचने वाले का नाम आरटीओ के रिकॉर्ड में दर्ज है तब तक वह थर्ड पार्टी के प्रति उत्तरदायी है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि गाड़ी बेची जा चुकी है या उसका कब्जा सौंपा जा चुका है।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला पंजाब हाई कोर्ट के एक फैसले को चुनौती देते हुए दायर हुई याचिका में दिया है। याचिका प्रकाशचंद डागा ने दायर की थी। याचिकाकर्ता ने अपनी सेंट्रो कार 11 सितंबर 2009 को श्वेता शर्मा को बेच दी थी। स्टाम्प पर लिखा-पढ़ी करने के बाद विक्रेता ने गाड़ी का कब्जा तो क्रेता को सौंप दिया लेकिन आरटीओ में गाड़ी मालिक के बतौर अपना नाम नहीं हटवाया। 9 अक्टूबर 2009 को गाड़ी से एक्सीडेंट हो गया। घायल व्यक्ति ने प्रकाशचंद्र को पक्षकार बनाते हुए क्लेम केस दायर कर दिया।

कोर्ट ने यह मानते हुए कि भले ही प्रकाशचंद्र ने गाड़ी बेच दी लेकिन आरटीओ के रिकॉर्ड में वे वाहन मालिक हैं। कोर्ट ने आदेश दिया कि प्रकाशचंद्र घायल को 12 लाख 47 हजार 739 रुपए बतौर मुआवजा अदा करें। इस फैसले को चुनौती देते हुए गाड़ी बेच चुके प्रकाशचंद्र ने हाई कोर्ट में अपील की। तर्क रखा कि जिस तारीख को एक्सीडेंट हुआ उसके पहले ही वे गाड़ी बेच चुके थे। उन्होंने स्टाम्प पर लिखा-पढ़ी करने के बाद गाड़ी का कब्जा खरीदार को सौंपा था।

हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने माना सही

हाईकोर्ट ने इन तमाम तर्कों को दरकिनार करते हुए जिला कोर्ट के फैसले को यथावत रखा और माना कि प्रकाशचंद्र डागा थर्ड पार्टी क्लेम के भुगतान से इनकार नहीं कर सकते। इस फैसले से आहत प्रकाशचंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। जस्टिस उदय उमेश ललित और जस्टिस सुभाष रेड्डी की बेंच ने वाहन विक्रेता की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने माना कि जब तक वाहन मालिक के बतौर विक्रेता का नाम आरटीओ में दर्ज है तब तक वह थर्ड पार्टी क्लेम के लिए जिम्मेदार है।

इंदौर में हैं हजारों वाहन

इंदौर में ही ऐसे हजारों वाहन हैं जो सौदा होने के सालों बाद भी पुराने मालिक के नाम पर ही चल रहे हैं। विक्रेता यह सोचकर निश्चिंत हो जाते हैं कि उन्होंने स्टाम्प पर लिखा-पढ़ी कर वाहन खरीदार को सौंप दिया है। वे कभी यह पता लगाने की कोशिश भी नहीं करते कि वाहन आरटीओ में ट्रांसफर हुआ भी है या नहीं। ऐसी स्थिति में कई बार विक्रेता परेशानी में भी पड़ जाते हैं।

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सम्पादक :- मध्यभारत live न्यूज़

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