आखिर राजनीतिक ग्रहण लग ही गया 100 साल से ज्यादा पुरानी विनोद मिल की चाल को

Share Post & Pages

बेशकीमती भूमि को कौड़ियों के दाम भू माफियाओं को बेचा सरकार ने, बाजार दर 10 से 12 हजार रुपए स्क्वेयर फिट फिर ₹834 स्क्वेयर फिट मैं कैसे दे दी जमीन, रहने की व्यवस्था भी नहीं की।

उज्जैन। (रामचंद्र गिरी गोस्वामी) आखिरकार विनोद मिल 100 साल से पुरानी श्रमिक चाल को राजनीतिक ग्रहण लग ही गया। पहले मिल बंद हुए फिर मिल् कि खाली जमीन पर भू माफियाओं की नजर पड़ी तो सरकार ने मजदूरों का हिसाब करने के बहाने इस जमीन को बेचने का फैसला ले लिया। अभी तक मजदूरों के खाते में राशि नहीं डाली गई है, लेकिन प्रशासन बस्ती उजाड़ने जा पहुंचा।

इधर नेताओं ने भी अपने अपने हितों के चलते श्रमिक समस्याओं और उनके उजरते आशियाने के प्रति आंखें मूंद ली। आखिर मजदूर राजनीतिक ग्रहण के शिकार हो ही गए।

Madhyabharatlive

मिल बंदी से लेकर श्रमिकों के पुनर्वास की योजना उनके पीएफ की राशि के भुगतान को लेकर भी राजनीतिक लचरता का आलम यह रहा की साडे तीन दशक तक मजदूरों का पैसा चुकता नहीं हो पाया। यदि उस समय पैसा मिल जाता तो श्रमिक बस्ती वाले कहीं भी भूखंड देख मकान ले लेते। अब उन्हें एन वक्त पर इधर-उधर योजनाओं के प्लाट लेने उन पर फाइनेंस कराने की बात कही जा रही है। लेकिन यह सब काम बस्ती उजाड़ने के पहले होना चाहिए था, किंतु राजनीतिक बयानबाजी होती रही।

भाजपा सरकार केवल उज्जैन से राहुल गांधी कि भारत जोड़ो यात्रा के गुजर जाने का इंतजार कर रही थी जैसे ही यात्रा गुजरी वैसे ही मुनादी कराकर विनोद मिल की चाल खाली करने का फरमान जारी कर दिया और पूरे क्षेत्र को छावनी में तब्दील कर दिया। इसके बाद डर और भय के चलते मजदूरों ने स्वयं अपने मकान का सामान हटाना शुरू कर दिया। इसी के साथ 100 साल से ज्यादा समय से यहां गुजर-बसर कर रहे परिवारों का क्षेत्र से नाता लगभग टूट सा गया है।

Follow Us Social media

सम्पादक :- मध्यभारत live न्यूज़