02/01/2026

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Billions in funding, yet still contaminated water: A waste of budget or a failure of bureaucracy?

Billions in funding, yet still contaminated water: A waste of budget or a failure of bureaucracy?

अरबों का फंड, फिर भी दूषित पानी: बजट की बर्बादी या अफसरशाही की नाकामी !

इंदौर की जल व्यवस्था: सिस्टम फेल आखिर क्यों? श्री सेन।

अरबों का बजट, अमृत योजनाएं और महापौर की चेतावनियां भी अफसरशाही की जद के आगे बौनी पड़ जाएं।

इंदौर। (वरिष्ठ पत्रकार – श्री विक्रम जी सेन) देश का सबसे स्वच्छ शहर, जो लगातार आठ वर्षों से स्वच्छता सर्वेक्षण में शीर्ष पर काबिज है, आज एक बुनियादी समस्या से जूझ रहा है: क्या स्वच्छता का तमगा सुरक्षित पेयजल की गारंटी भी देता है?

भागीरथपुरा दूषित पानी कांड ने इस मिथक को तोड़ दिया है। यह सिर्फ एक इलाके की स्वास्थ्य आपदा नहीं, बल्कि पूरी शहरी जल प्रशासन व्यवस्था की गहरी खामियों का प्रमाण है।

लेकिन इस संकट में एक व्यक्ति की भूमिका उजागर होती है महापौर पुष्यमित्र भार्गव की, जिन्होंने समय रहते चेतावनी दी, निरीक्षण का आग्रह किया और सिस्टम की नाकामी को खुलकर उजागर किया।

यह अजीब परिस्थिति महापौर के अंतर्मन की पीड़ा को उजागर करतीं है, क्योंकि समस्या पानी की नहीं, बल्कि अफसरशाही की जिद और जवाबदेही के अभाव की है।

महापौर बनाम निजाम: टकराव क्यों? —

महापौर की सक्रियता का प्रमाण —

महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने बार-बार अफसरों से सवाल किए: क्या इंदौर सिर्फ दिखने में स्वच्छ है, या जीने लायक सुरक्षित भी? भागीरथपुरा प्रकरण से पहले ही उन्होंने संबंधित अफसरों को बीमारी की सूचनाएं दीं, मैदानी निरीक्षण का आग्रह किया और नगर निगम की कई बैठकों में अफसरों की निष्क्रियता को उजागर किया। लेकिन निजाम अपनी रफ्तार से चला, सुविधा से चला। यही कारण है कि महापौर को कहना पड़ा, “ऐसे सिस्टम में काम करना मुमकिन नहीं।” यह कथन राजनीतिक असंतोष नहीं, बल्कि एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि की प्रशासनिक हताशा है, जो जनहित के लिए सिस्टम से टकरा रहा है।

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी इस घटना पर दुख जताया और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया, लेकिन सवाल यह है कि महापौर की पूर्व चेतावनियों पर अमल क्यों नहीं हुआ? जांच रिपोर्ट्स से साफ है कि दूषित पानी का कारण पाइपलाइन में लीकेज था, जहां सीवर का पानी मिल गया। महापौर ने प्रारंभिक जांच में इसे अफसरों की लापरवाही बताया, और कहा कि पाइपलाइन रखरखाव में जिम्मेदार लोगों की गलती है।

उनकी यह बात सही साबित हुई, जब जोनल अधिकारी शालीग्राम शितोले और असिस्टेंट इंजीनियर योगेश जोशी को निलंबित किया गया, और एक सब-इंजीनियर को बर्खास्त।

भागीरथपुरा दूषित पानी कांड को लेकर गुरुवार को रेसीडेंसी कोठी में हुई बैठक में अधिकारियों के रवैये को लेकर महापौर पुष्यमित्र भार्गव का गुस्सा जमकर फूटा। उन्होंने एसीएस (अपर मुख्य सचिव) संजय दुबे से यहां तक कह दिया कि अधिकारी सुनते नहीं हैं। मैं ऐसे सिस्टम में काम नहीं कर सकता। आप चाहो तो यह संदेश मुख्यमंत्री तक पहुंचा दो। एसओआर आया नहीं, इसके पहले अधिकारियों ने फाइल स्वीकारना बंद कर दी। अधिकारी संवाद तक नहीं करते।

कलेक्टर की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल —

महापौर ने कलेक्टर शिवम वर्मा पर नाराजगी जताते हुए कहा कि कलेक्टर साहब, मैंने आपको दो दिन पहले मैसेज किया था कि भागीरथपुरा में उल्टी-दस्त के मरीज मिले हैं, आप जाकर देखो, लेकिन आपने कुछ नहीं किया। सोमवार को जब हम अस्पताल पहुंचे जिसके बाद आप सक्रिय हुए। अगर समय रहते संज्ञान ले लिया जाता तो स्थिति इतनी नहीं बिगड़ती।

बैठक के दौरान एक अपर आयुक्त के पास पांच-पांच विभागों का प्रभार होने की बात भी उठी। महापौर ने कहा कि अधिकारियों की वजह से काम प्रभावित हो रहा है। उन्होंने असहजता जताते हुए हाथ खड़े कर दिए और कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में काम करना कठिन है। मैं इसके लिए राजनीति में नहीं आया था। यह संदेश मुख्यमंत्री तक पहुंचा दें।

एसीएस दुबे ने कहा कि हम इंदौर नगर निगम को कुछ और अधिकारी दे देते हैं, इस पर महापौर ने कहा कि अधिकारियों की कमी नहीं है। जो अधिकारी हैं वे ईमानदारी से काम कर लें तो स्थिति सुधर जाएगी, लेकिन निगमायुक्त ने एक अपर आयुक्त को पांच-पांच विभाग दे रखे हैं जबकि दूसरे अपर आयुक्त फ्री हैं।

“बता दें, एक काम के लिए कितनी बार फोन करना पड़ेगा”

महापौर ने बार-बार कहा कि ऐसी स्थिति में काम करना मुश्किल है। अधिकारी काम ही नहीं करना चाहते हैं। वे मुझे बता दें कि एक काम के लिए कितनी बार फोन करना पड़ेगा। अगर वे कहेंगे कि सौ बार, तो मैं सौ बार फोन लगाऊंगा, लेकिन 101वीं बार मैं फोन एसीएस दुबे को करूंगा।

महापौर ने दुखद हादसे की खुद जिम्मेदारी स्वीकारी, लेकिन वरिष्ठ अफसरों पर भी कार्रवाई की मांग की, जो सिस्टम की जड़ता को दर्शाता है।

अरबों का फंड, फिर भी दूषित पानी: बजट की बर्बादी या अफसरशाही की नाकामी? —

इंदौर में पिछले एक दशक में जल आपूर्ति और सीवरेज सुधार के लिए हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। नर्मदा जल प्रदाय परियोजना, अमृत योजना (AMRUT), अमृत 2.0 और स्मार्ट सिटी मिशन के तहत कुल अनुमानित व्यय 4,000-6,000 करोड़ रुपये है (राज्य बजट, केंद्रांश और नगर निगम हिस्से सहित)। हाल ही में, अमृत 2.0 के तहत एसपीएमएल इंफ्रा को 1,073 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट दिया गया, जिसमें 1,650 एमएलडी का रॉ वाटर इंटेक, 400 एमएलडी का ट्रीटमेंट प्लांट, पंपिंग स्टेशन और 22 किमी पाइपलाइन शामिल है।

इसके अलावा, नर्मदा फेज IV और अमृत 2.0 के लिए 965 करोड़ रुपये मंजूर हुए।

स्मार्ट सिटी के तहत एरिया बेस्ड डेवलपमेंट (ABD) प्रोजेक्ट में वाटर सप्लाई और सीवरेज के लिए 697 करोड़ रुपये का प्रावधान है, जिसमें नई पाइपलाइन, जीएसआर और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क शामिल हैं।

कागज पर दावे बड़े थे: 24×7 सुरक्षित पेयजल, पुरानी लाइनों का पूर्ण प्रतिस्थापन, सीवर और पेयजल लाइनों का पृथक्करण, लीकेज शून्य और जलजनित बीमारियों में कमी। लेकिन जमीनी हकीकत? भागीरथपुरा में सीवर मिश्रण की पुष्टि, पुरानी 40-50 साल पुरानी पाइपलाइन अभी भी चालू, और अधूरे सीवर कनेक्शन।
फंड की कमी नहीं, लेकिन इच्छाशक्ति की। महापौर ने इन मुद्दों पर पहले ही अफसरों को चेताया था, लेकिन उनकी अनदेखी ने संकट को जन्म दिया।

प्रशासनिक ढांचा: जिम्मेदारी सबकी, जवाबदेही किसी की नहीं —
महापौर की यहीं तो अफसरों से निरंतर लड़ाई होती रहीं हैं। महापौर द्वारा भागीरथपुरा की शिकायतें अफसरों के संज्ञान में पहले लाई गई, जब मरीज पहले मिले, तो महापौर द्वारा अफसरों को चेतावनी पहले दी गई, लेकिन कार्रवाई तब हुई जब मौतें हो गईं

12-14 मौतें और 162 से ज्यादा अस्पताल में भर्ती —

प्रारंभ में इस दुखद हादसे के समय स्वास्थ्य विभाग ने लीपा पोती की कोशिश करते हुए मात्र तीन मौतें बताईं, लेकिन महापौर ने सात की पुष्टि की, जो उनकी मैदानी जानकारी और वास्तविकता उजागर करने की क्षमता को दर्शाती है।

यह प्रशासनिक संस्कृति का लक्षण है, जहां फाइलें मीडिया संकट पर चलती हैं, और मैदानी निरीक्षण ‘असुविधा’ माने जाते हैं।

नगर निगम में एक अपर आयुक्त के पास चार-पांच विभाग, यह अव्यवस्था नहीं, जानबूझकर की गई लापरवाही है। नतीजा: निर्णयों में देरी, फील्ड कंट्रोल शून्य। महापौर भार्गव इस पूरे घटनाक्रम में अलग खड़े दिखे: उन्होंने बीमारी की सूचना पहले दी, हालात पर चेताया, अफसरों से संवाद किया और खुले मंच पर सिस्टम पर सवाल उठाए। उनका बयान “ऐसे सिस्टम में काम करना मुमकिन नहीं” एक संवैधानिक पदधारी की हताशा है, जो जनप्रतिनिधि की चेतावनी को नजरअंदाज करने वाले निजाम से टकरा रहा है।

मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने लापरवाही स्वीकारी और कहा कि दोषी बख्शे नहीं जाएंगे, चाहे कितने बड़े हों।

लेकिन महापौर और अफसरों के बीच समन्वय की कमी का जिक्र आया, जो वास्तव में अफसरशाही की जिद को उजागर करता है।

अधिकारी क्यों नहीं सुनते? —

क्योंकि सिस्टम जवाबदेह नहीं —-

अधिकारी जानते हैं कि लापरवाही का दंड नहीं मिलेगा, जांच सामूहिक, कार्रवाई संस्थागत, दंड स्थानांतरण तक। लोग बीमार पड़ते हैं, सिस्टम नहीं। महापौर ने इस जड़ता के खिलाफ आवाज उठाई, जो उनकी जनहित प्रतिबद्धता दिखाती है।

भागीरथपुरा चेतावनी है: महापौर की दूरदृष्टि को जानें —

विधायकों ने कहा कि दूषित पानी हर बस्ती की समस्या है, हजारों शिकायतें लंबित। नगर निगम रिएक्टिव मोड में है, प्रिवेंटिव में नहीं। आज भागीरथपुरा, कल कोई और जब तक सिस्टम नहीं बदलेगा। महापौर ने इसे पहले भांपा, लेकिन उनकी चेतावनी अनसुनी रही।

सवाल सत्ता और जिम्मेदारी का —

इंदौर की जल व्यवस्था का संकट तकनीकी नहीं, नैतिक और प्रशासनिक है।
यह लड़ाई मेयर बनाम अधिकारी की नहीं, जनहित बनाम जड़ निजाम की है। महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने जनता के लिए सिस्टम से टकराया, चेतावनी दी और कार्रवाई की मांग की। जब तक फंड का स्वतंत्र ऑडिट, अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही और जनप्रतिनिधियों की चेतावनी को आदेश का दर्जा नहीं मिलेगा, इंदौर स्वच्छ तो रहेगा, लेकिन सुरक्षित नहीं।

महापौर का पक्ष अपने स्तर पर मजबूत है, वे मज़बूत लालफीताशाही में राजनीति करने नहीं, समाधान का हिस्सा बनने के प्रयास करते हैं।

संपादक- श्री कमल गिरी गोस्वामी

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