इंदौर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने धार जिले के विश्व विख्यात राजा भोज के नाम से प्रशिद्ध भोजशाला परिसर पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इसे माँ वाग्देवी का मंदिर घोषित कर दिया है।
आइये जानते हैं वे कौन से बिंदु हैं जो निर्णय का आधार बने।
ASI को भोजशाला परिसर में 106 खंबे और 82 स्तंभ मिले : इनकी स्थापत्य शैली मंदिरों जैसी पाई गई। इनमें देवी-देवताओं और मानव आकृतियों को बाद में विकृत किए जाने के संकेत मिले।
कई आकृतियां छेनी से काटी गई थीं। कोर्ट ने इसे महत्वपूर्ण माना। ASI के सर्वे में बताया गया की इन आकृतियों को मिटाने या बदलने के लिए इनके साथ छेड़खानी की गई और उन्हें खंडित किया गया।
क्योंकि अयोध्या फैसले में भी धार्मिक प्रतीकों और स्थापत्य अवशेषों को अहम साक्ष्य माना गया था।
एएसआई को सर्वे में 150 से अधिक संस्कृत और प्राकृत शिलालेख मिले। इनमें सरस्वत्यै नमः और ॐ नमः शिवाय जैसे उल्लेख थे।
एक बड़े शिलालेख में पारिजातमंजरी-नाटिका का उल्लेख मिला, जिसमें लिखा था कि इसका मंचन “शारदा देवी के सदन” में हुआ था।
इससे निष्कर्ष निकला कि भोजशाला संस्कृत अध्ययन और देवी सरस्वती उपासना से जुड़ा स्थान है। इंपिरियल गजेटेयर ऑफ इंडिया सहित अन्य ऐतिहासिक स्रोतों के हवाले से कोर्ट ने भोजशाला को राजा भोज से जुड़ा माना और कहा कि गजेटियर अंतिम प्रमाण नहीं होते, लेकिन सहायक साक्ष्य के रूप में महत्वपूर्ण हैं।
कोर्ट ने माना कि वर्तमान ढांचे में पुराने मंदिर के हिस्सों का इस्तेमाल हुआ।
पुराने स्तंभ, मूर्तियां, बीम, खिड़कियां और शिलालेखों को काटकर या विकृत कर संरचना तैयार की गई थी।


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