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Home » मध्यप्रदेश » भोजशाला, 100 साल का इंतजार खत्म, कोर्ट ने कहा – मंदिर है

फैसला, क्या ‘भोजशाला’ को घोषित किया मंदिर।

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हिंदुओं को मिलेगा नियमित पूजा का अधिकार।

धार। मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक और विवादित भोजशाला मामले में आज इंदौर हाई कोर्ट ने एक युगांतकारी निर्णय सुनाया है। वर्षों से चली आ रही कानूनी लड़ाई और 98 दिनों के गहन वैज्ञानिक सर्वेक्षण के बाद, अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि भोजशाला मूल रूप से देवी वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर है।

अदालत ने अपने फैसले में न केवल हिंदुओं को नियमित पूजा का अधिकार दिया है, बल्कि मुस्लिम पक्ष के दावों को खारिज करते हुए 2003 के उस पुराने आदेश को भी रद्द कर दिया है, जिसके तहत वहां शुक्रवार को नमाज़ की अनुमति थी।

हाई कोर्ट के फैसले की 5 बड़ी बातें

  1. नियमित पूजा की अनुमति: कोर्ट ने हिंदुओं को भोजशाला में प्रतिदिन पूजा-अर्चना करने की अनुमति दे दी है। अब पूजा केवल मंगलवार तक सीमित नहीं रहेगी।

  2. ASI की रिपोर्ट पर मुहर: कोर्ट ने आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) की उस वैज्ञानिक रिपोर्ट को पूरी तरह मान्य किया, जिसमें कहा गया था कि वर्तमान ढांचा एक प्राचीन हिंदू मंदिर के अवशेषों पर खड़ा है।

  3. 2003 का आदेश रद्द: एएसआई के 7 अप्रैल 2003 के आदेश को कोर्ट ने अवैध माना, जिसने हिंदुओं को सीमित अधिकार दिए थे और शुक्रवार को नमाज़ की व्यवस्था की थी।

  4. लंदन से लौटेगी वाग्देवी: अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि लंदन के म्यूजियम में रखी वाग्देवी की मूल प्रतिमा को भारत वापस लाने की प्रक्रिया पर गंभीरता से विचार किया जाए।

  5. मस्जिद के लिए वैकल्पिक भूमि: मुस्लिम समुदाय के धार्मिक हितों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने कहा कि यदि वे आवेदन करते हैं, तो राज्य सरकार धार में मस्जिद निर्माण के लिए अलग से जमीन आवंटित करने पर विचार कर सकती है।

वैज्ञानिक साक्ष्यों ने पलटा पासा

सर्वेक्षण के दौरान भोजशाला परिसर में गणेश, ब्रह्मा, नरसिंह और भैरव जैसे हिंदू देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां और संस्कृत व प्राकृत भाषा के शिलालेख मिले थे। एएसआई की रिपोर्ट ने साबित किया कि राजा भोज द्वारा 1034 ईस्वी में स्थापित यह केंद्र मूलतः एक संस्कृत विद्यालय और सरस्वती मंदिर ही था। हालांकि, जैन समुदाय ने भी यहाँ ‘देवी अंबिका’ की मूर्ति होने का दावा किया था, लेकिन साक्ष्यों की कमी के चलते अदालत ने उसे स्वीकार नहीं किया।

“यह सत्य और सनातन की जीत”: भाजपा विधायक

फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज है। भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने इस पर खुशी जाहिर करते हुए इसे “सत्य और सनातन की जीत” करार दिया।

“मुगलों ने मंदिर तोड़े, हमारी संस्कृति को कुचला, लेकिन सत्य कभी पराजित नहीं होता। मैं उन करोड़ों बलिदानियों को नमन करता हूं जिन्होंने इस लड़ाई को जीवित रखा। अब समय आ गया है कि मुस्लिम पक्ष भी सत्य स्वीकार करे और जहां-जहां मंदिरों को तोड़कर स्मृति चिन्ह बनाए गए हैं, उन्हें वापस कर दोस्ती का हाथ बढ़ाए।” — रामेश्वर शर्मा, विधायक।

क्या था मामला?

धार की भोजशाला को लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्ष के बीच दशकों से विवाद चल रहा था। हिंदू पक्ष इसे मां सरस्वती का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे ‘कमाल मौला मस्जिद’ बताता रहा है। 12 मई 2026 को कोर्ट ने पांच मुख्य याचिकाओं पर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा था, जिसे आज 15 मई को सार्वजनिक कर दिया गया।

प्रशासनिक रुख: वर्तमान में पूरे परिसर का नियंत्रण ASI के पास ही रहेगा, जिसे 1904 से ही एक संरक्षित स्मारक माना गया है। अब देखना यह है कि इस ऐतिहासिक फैसले के बाद क्षेत्र में सुरक्षा और धार्मिक व्यवस्थाओं को प्रशासन किस तरह लागू करता है।

संपादक- श्री कमल गिरी गोस्वामी

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