आश्रम और छात्रावासों (Hostels) में प्रवेश (Admission) के नाम पर होने वाली धांधली और भ्रष्टाचार एक गंभीर समस्या है। फर्जी दस्तावेजों, पैसे लेकर सीट बेचने या नियमों की अनदेखी करने जैसी कई गड़बड़ियों सामने आती है। इनको रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जाने चाहिए हैं।
धार। (लकी जाजू ) आश्रम और छात्रावासों में अनाथ एवं विकलांग बच्चों को पहली प्राथमिकता (First Priority) मिलने का स्पष्ट नियम होता है। अगर इसके बावजूद उनका नाम वेटिंग लिस्ट में डाल दिया गया है, तो यह नियमों का सीधा उल्लंघन है और व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। इसके पीछे एक वजह यह भी हो सकती है कि जिन बच्चों का पहली प्राथमिकता से आश्रम और छात्रावास में एडमिशन कर लिया गया है उनके पीछे कहीं ना कहीं राजनीतिक रशुख का हाथ होता है या फिर बड़े लेनदेन का।
नियमों को ताक पर रखने के मुख्य कारण —
- सीटों की सीमित संख्या: कई बार विज्ञापित सीटों से अधिक आवेदन आने पर सॉफ्टवेयर या कमेटी द्वारा त्रुटिवश वरीयता क्रम (Priority Order) बदल जाता है।
- दस्तावेजों का अधूरा होना: अनाथ या विकलांग श्रेणी का वैध प्रमाण पत्र (जैसे माता-पिता का मृत्यु प्रमाण पत्र या महिला एवं बाल विकास विभाग का सर्टिफिकेट) समय पर जमा न होना या पोर्टल पर अपलोड न होना।
- सिस्टम या पोर्टल की गड़बड़ी: ऑनलाइन लॉटरी या आवंटन सॉफ्टवेयर में तकनीकी खामी (Technical Glitch) के कारण प्राथमिकता श्रेणी का ठीक से फिल्टर न हो पाना।
- प्रशासनिक लापरवाही या पक्षपात: स्थानीय अधिकारियों या चयन समिति द्वारा नियमों की अनदेखी कर अन्य आवेदकों को अनुचित लाभ देना।
यदि आपको लगता है कि चयन प्रक्रिया में धांधली हुई है, तो आप इन माध्यमों से इसकी शिकायत दर्ज करा सकते हैं:
- संबंधित विभाग में लिखित शिकायत: जिले के सहायक आयुक्त (आदिवासी विकास / अनुसूचित जाति कल्याण) या जिला कार्यक्रम अधिकारी (महिला एवं बाल विकास विभाग) को लिखित आपत्ति (Objection) दर्ज कराएं।
- कलेक्टर/टीएल बैठक में शिकायत: हर मंगलवार को होने वाली जिला कलेक्टर की समय-सीमा (TL) बैठक या जनसुनवाई में सीधे आवेदन सौंपें।
- सीएम हेल्पलाइन (CM Helpline): अपने राज्य की सीएम हेल्पलाइन (जैसे 181 या संबंधित पोर्टल) पर इसकी ऑनलाइन या फोन के माध्यम से शिकायत दर्ज करें। यह बेहद प्रभावी होता है क्योंकि इसकी मॉनिटरिंग उच्च स्तर से होती है।
- बाल अधिकार संरक्षण आयोग (SCPCR): राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग को पत्र या ईमेल भेजकर मामले की जांच की मांग करें।

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