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विश्व पर्यटन नगरी के मुख्य मार्ग पर हॉस्पिटल की मनमानी: बिना पार्किंग कैसे मिली एनओसी? नगर पालिका और सीएमएचओ कार्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल!

पर्यटन को कलंकित करता ‘नो पार्किंग’ अस्पताल: राजमार्ग बना पार्किंग ज़ोन, वीआईपी रूट पर लग रहा लंबा जाम!

धार। विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी को जोड़ने वाले मुख्य राजमार्ग पर नियमों को ताक पर रखकर संचालित हो रहे तिरुपति हॉस्पिटल पर अब जनता और जागरूक नागरिकों ने गंभीर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल नगर पालिका प्रशासन और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) कार्यालय की भूमिका पर खड़ा हो रहा है कि आखिरकार बिना वाहन पार्किंग व्यवस्था के इस चिकित्सालय को अनुमतियां और अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) किस आधार पर जारी कर दिए गए?
नियम ताक पर, राजमार्ग के भरोसे अस्पताल!
किसी भी कमर्शियल बिल्डिंग और खासकर अस्पताल जैसे संवेदनशील संस्थान के लिए सबसे पहली और अनिवार्य शर्त पर्याप्त पार्किंग व्यवस्था की होती है। तिरुपति हॉस्पिटल में इलाज के लिए आने वाले मरीजों, उनके परिजनों और डॉक्टरों के वाहनों के लिए परिसर के भीतर कोई जगह नहीं है। नतीजा यह है कि अस्पताल के सामने का मुख्य राजमार्ग ही अब ‘अनाधिकृत पार्किंग ज़ोन’ में तब्दील हो चुका है।
क्या राजमार्ग सिर्फ पार्किंग के लिए है?
स्थानीय नागरिकों और राहगीरों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है। लोगों का पूछना है कि क्या इस महत्वपूर्ण राजमार्ग को सिर्फ एक अस्पताल की पार्किंग के लिए छोड़ दिया गया है? यह मार्ग कोई आम सड़क नहीं है, बल्कि विश्व पर्यटन नगरी को देश-दुनिया से जोड़ने वाला मुख्य मार्ग है, जहां से प्रतिदिन हजारों देशी-विदेशी पर्यटक और वीआईपी गुजरते हैं।
जिम्मेदार मौन, उठ रहे भ्रष्टाचार के आरोप
इस पूरे मामले में नगर पालिका और स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी भी बड़े सवाल खड़े करती है।
  • बड़ा सवाल 1: जब मौके पर पार्किंग स्पेस था ही नहीं, तो नगर पालिका ने बिल्डिंग परमिशन और एनओसी कैसे दे दी?
  • बड़ा सवाल 2: स्वास्थ्य विभाग (CMHO) ने अस्पताल के पंजीयन और नवीनीकरण के दौरान नियमों की अनदेखी क्यों की?
  • बड़ा सवाल 3: क्या पर्यटन नगरी की छवि को दांव पर लगाकर किसी रसूखदार को फायदा पहुंचाया जा रहा है?
मुख्य मार्ग पर बेतरतीब खड़े वाहनों के कारण आए दिन दुर्घटना की आशंका बनी रहती है और लंबे जाम से पर्यटन नगरी की छवि धूमिल हो रही है।
अब देखना यह है कि इस गंभीर लापरवाही पर जिला प्रशासन और उच्च अधिकारी क्या संज्ञान लेते हैं, या फिर नियमों को इसी तरह सड़क पर तमाशा बनने के लिए छोड़ दिया जाएगा।

संपादक- श्री कमल गिरी गोस्वामी

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