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लोकसभा सीट के लिये अनेकों सोये उम्मीदवार रतजगा कर रहे है?

अयोध्या मे राममंदिर के निर्माण से बनी लहर पर सवार भाजपा मे धार लोकसभा सीट के लिये अनेकों सोये उम्मीदवार रतजगा कर रहे है?

धार। (मदन काबरा) जनजाति लोकसभा सीट धार वैसे किसी एक दल की बपौती नही रही, क्योंकि जो जितना सक्रिय एवं विकास को समर्पित रहा,दलालों की दलाली प्रथा से दूर रहा उस दल का सासंद इस सीट पर काबिज रहा।जनसंघ के जमाने से इस सीट पर जनसंघ का अखण्ड दीया स्व.भारतसिंह चौहान जनता के लिए विकास का दीपदान करते हुए दीप जलाते रहे है।

इस तरह यह सीट जनसंघ से लेकर भाजपा के सफर तक दीयें के साथ अधिकांशतः कमल का फुल खिलाती रही है।पिछले दो लोकसभा चुनाव मे भाजपा प्रत्याशी अपनी छबि से नही,भाजपा के नेता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश का प्रधान बनाने मे इस क्षेत्र की जनता ने भाजपा की झोली मे आँख मिचकर सासंद तो दे दियें, परन्तु इन सासंदो ने पार्टी के संविधान एवं घोषणा अनुसार न तो कोई काम किये न ही जनजाति क्षेत्रों मे आम जनता के अपेक्षाओं के साथ विकास की गाथाएं गढ़ी गई, यही नही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक अभिनव योजना आदर्श गांव का चयन तो कागजातों पर तो हो गया, परन्तु यथार्थ के धरातल पर सासंदो का विकास शुन्य नजर आया?

यही कारण रहा कि, लोकसभा चुनाव 2018 मे भाजपा ने प्रत्याशी बदलकर अपने ही पूर्व सासंद पर इस आस से दाँव लगाया था कि, वे अब कुछ अच्छा करेंगे, परन्तु उनके स्वंय के पूर्व कार्यकाल से एवं पूर्व सासंद के कार्यकाल से यह कार्यकाल सबसे ज्यादा नीरस, निष्क्रिय, एवं लापरवाही से लबरेज रहा। अनेक विधानसभा मे पूरे पांच बरस तक सासंद का चेहरा देखने को मतदाता तरसें तो क्षेत्र के विकास के लिये भाजपा व जनप्रतिनिधियों की उपेक्षापूर्ण रवैये ने जो परिणाम दिये,तथा आगामी लोकसभा चुनाव के लिये इशारों इशारों मे जो संकेत दे दिये,उसे भाजपा संघठन कितनी गहराईयो से लेते हुएँ, इस मर्तबा रामलहर पर सवार भाजपा किसके पक्ष मे,किन चेहरों पर दाँव आजमाती है यह देखना है।

धार लोकसभा क्षेत्र मे धार जिले की सात विधानसभा सीटों के साथ, इन्दौर जिले की महु विधानसभा सीट मिलाकर एक संसदीय क्षेत्र बना है।जिसमे से तीन पर भाजपा व पांच पर कांग्रेस की विजयी भाजपा संगठन के नेतृत्व की कमजोरियों को साबित तो करती है।

माना कि, बदनावर व मनावर विधानसभा सीट भीतरघात के चलते बहुत कम मतों से हारे है,तो कांग्रेस भी धरमपुरी से बहुत कम अतंर से हारी है।

इसलिये जनजाति धार संसदीय सीट पर भाजपा को चौकस,चौकन्नी होकर सजगतापूर्वक तथा सक्रियता के साथ जहाँ चुनाव की चुनौतियों के साथ मैदानेजंग होना पड़ेगा। वही इस जनजाति लोकसभा सीट धार से अपना उम्मीदवार भी साफ स्वच्छ छबि का चेहरा, विकासशील सोच के साथ, आमज़नता के साथ अपने को जोड़ रखने का माद्दा रखनेवाला एक इमानदार व्यक्तित्व की खोज कर उसे उम्मीदवार बनाया गया तो ही भाजपा कांग्रेस के उम्मीदवार को टक्कर दे सकती है। क्योंकि इस जनजाति धार लोकसभा सीट के लिये हालफिलहाल कांग्रेस मजबूत नजर आती है, वही विधानसभा मे प्रतिपक्ष नेता उमंग सिंघार का विधानसभा एवं गृह जिला भी होने से उनकी अपनी भी प्रतिष्ठा दाँव पर रहेगी, वही हाईकमान को अपनी योग्यता व काबलियतता का प्रदर्शन के मौके को वे भुनाने के लिये पूरी जोर आजमाईश कर यह सीट कांग्रेस के पक्ष मे करने की कोशिश भी करेंगे। इसलिये यह तय है कि, भाजपा व कांग्रेस दोनो ही दल मुख्य प्रतिद्धंदी दल है इन दोनों दलों को अपने अपने उम्मीदवार फुंक फुंक कर ढुंढ़कर अपने दल का उम्मीदवार बनाना कसौटी पूर्ण होगा।

भाजपा मे तो उम्मीदवारों की एक लंबीफेहरिस्त सूची देखी जा रही है।जिनमें पूर्व सासंद पुर्व विधायक के साथ संघ एवं उसके प्रकल्पों मे कार्यरत पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं मे समाज सेवा के लिए, संघ व संगठन का प्लेटफार्म छोड़कर धार संसदीय सीट से अपनी उम्मीदवारी के लिये, अपने बिस्तर से उठकर जाग गये है,जिन्हें अपने गृहक्षेत्र मे पहचाना नही जाता, जो इन्दौर मे आलीशान बंगलों मे रहकर, भाजपा शासन मे ही विकास की शिकायतें करना व तबादले करवाने मे अपनी ऊर्जाओं का व्हास कर रहे है वे सभी उम्मीदवार की दौड़ मे धावक बन रहे है।क्योंकि जनजाति नेताओं को यही लग रहा है कि, भाजपा का यह गोल्डेन समय है बस संघर्ष सिर्फ टिकट का है,टिकट मिला तो गढ़ जीतने की उम्मीदें वैतरणी की तरह है।

देखना यह है कि,भाजपा इस नाजुक राजनीतिक माहौल मे इस जनजाति सीट धार से उम्मीदवार का पैमाना किस तरह तय कर जनता के समक्ष पेश करती है। क्योंकि न तो भाजपा के पास न ही कांग्रेस के पास ऐसा कोई उम्मीदवार है जो अपने जीवन का कुछ भी अंश इस क्षेत्र की आम जनता के दुखदर्दो मे भागीदारी निभाई हो या इस जनजाति क्षेत्र मे विकास के खाते के नाम कुछ भी लाईन लिखी नजर आती है।बस चुनाव आता है, नींद से ऐसे उठते है कि,जैसे संगठन उन कुंभकर्ण की तरह नींद से जागने का ही इतंजार ही कर रहा हो।

परन्तु यह तय है कि, न तो कांग्रेस के पास या न ही भा.ज.पा. के पास ऐसे उम्मीदवार की सूची है कि, जो अपने राजनीतिक केरियर के लिये वह संसदीय क्षेत्र मे सक्रियता से कार्य करता हो या उसकी सम्पूर्ण ससंदीय क्षेत्र मे उसकी अपनी कोई पहचान हो।

इसलिये जो भी उम्मीदवार आयेगा वह राजनीति के व्यवसायिक द्दष्टिगत से पारगंत होगा या आममतदाताओं से अनभिज्ञ होगा। यह अनभिज्ञ ही काबलियतता से परिपूर्णता से इस क्षेत्र का सासंद लाभदायक साबित हो सकता है। बशर्ते की उसकी पारिवारिक परिस्थितियों मे राजनीति का पुट हो,वह घर से ही राजनीति का ककहरा सीखा हुआ हो।

प्रधान संपादक- कमलगिरी गोस्वामी

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