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देश में सौगातों की जगह जरूरत है रोजगार की

भोपाल। (डॉ. चन्दर सोनाने) हाल ही में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने मध्यप्रदेश के रतलाम में एक चुनावी सभा में घोषणा की कि 80 करोड़ गरीबों को मुफ्त अन्न वितरण योजना को अगले 5 साल और चलाया जायेगा। यानी देश की आजादी के 75 साल बीत जाने के बाद आज भी देश में 80 करोड़ ऐसे गरीब हैं, जिन्हें दो समय भरपेट रोटी भी मुहैया नहीं है। यह अत्यन्त दुखद और आश्चर्यजनक है।

किन्तु आज देश को मुफ्त सौगातों की जरूरत नहीं है, बल्कि उन्हें रोजगार की अत्यन्त आवश्यकता है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी सीएमआईई की हाल ही में जारी रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर में बेरोजगारी दर 10.05 प्रतिशत हो गई है। यह दर पिछले करीब दो साल में सबसे ज्यादा रही है। इसका मूल कारण यह था कि ग्रामीण भारत में काम देने वाली प्रक्रियाओं, उपक्रमों और प्रतिष्ठानों में आर्थिक सुस्ती छाई है। यह स्थिति अत्यन्त भयावह है।

प्रधानमंत्री ने चुनावी मंच से यह वादा किया कि किसी भी गरीब के घर चुल्हा जलना बंद नहीं होने देंगे, किन्तु यहाँ सवाल यह है कि क्यों देश में आज भी 80 करोड़ जरूरतमंदों के पास इतना भी पैसा नहीं है कि पेट की भूख शांत कर सके। आदर्श स्थिति तो यह होना चाहिए कि मुफ्त के राशन से पेट पालने की जगह हर नागरिक शान से अपनी कमाई से जीवन यापन करें और अपने परिवार को अच्छी शिक्षा और अच्छा स्वास्थ्य उपलब्ध करा सके। किन्तु यह हो नहीं रहा है, यह अत्यन्त दुखद है।

रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर श्री रघुराम राजन ने हाल ही में कहा है कि देश में जितनी जरूरत है, उतनी नौकरियों के लिए आर्थिक विकास दर 8 प्रतिशत से ऊपर रखनी होगी। अभी यह दर 6 से 6.5 प्रतिशत ही है। इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही अप्रैल से जून के दौरान देश की विकास दर 7.8 प्रतिशत है। दूसरी तिमाही में यह 7 प्रतिशत रह सकती है। वित्त मंत्रालय ने अनुमान लगाया है कि अगले साल मार्च में खत्म होने वाले चालू वित्त वर्ष में देश की विकस दर 6.5 प्रतिशत रहेगी। यूनिवर्सल ब्रिटिश बैंक और फाइनेंशियल सर्विसेस ग्रुप एचएसबीसी ने यह अनुमान लगाया है कि अगले 10 साल में भारत को 7 करोड़ से ज्यादा नए नौकरियों के मौके पैदा करने होंगे। यदि भारत की औसत विकास दर 6.7 प्रतिशत रही तो ऐसी स्थिति में अगले दशक में जरूरत की सिर्फ एक तिहाई यानी 33 प्रतिशत नौकरियाँ ही पैदा होगी। और यदि इस दौरान भारत की औसत विकास दर 7.5 प्रतिशत रहती है तो भी इससे जरूरत की सिर्फ दो तिहाई नौकरियाँ ही पैदा होगी।

यह गंभीर और चितांजनक स्थिति है।

वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए केंद्रीय बजट में ग्रामीण नौकरी गारंटी योजना और महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के लिए बजटीय आवंटन में 30 प्रतिशत की कटौती की गई है। इसे घटाकर अब 61,032.65 करोड़ रुपए कर दिया गया है। यह 2022-23 के संशोधित अनुमान 89,154.65 करोड़ रुपए से 30 फीसदी कम है। यह योजना के बजटीय आवंटन में दूसरी सीधी कटौती है। वर्ष 2022-23 के बजट में भी मनरेगा के बजटीय आवंटन में 98,000 करोड़ रुपए के संशोधित अनुमान से 25 प्रतिशत की कटौती कर 73,000 करोड़ रुपए कर दिया गया था।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना मनरेगा देश भर के ग्रामीण परिवार को साल में केवल 100 दिनों का वेतन आधारित रोजगार देती है। मनरेगा को 2005 में संसदीय अधिनियम के माध्यम से पेश किया गया था और महिलाओं के लिए एक तिहाई ग्रामीण नौकरियों को निर्धारित किया गया था। वर्षों से यह योजना गेमचेंजर के रूप में काम कर रही है। लाखों ग्रामीण परिवारों ने इसके माध्यम से रोजगार प्राप्त किया है।

कोरोना काल के दौरान, लाखों प्रवासी श्रमिकों को इसके तहत काम मिला था, जब वह अपने मूल स्थानों पर लौटने के लिए मजबूर हुए थे।

प्रैक्टिशनर डेवलपमेंट इकोनॉमिस्ट और स्पात मंत्रालय की पूर्व सचिव डॉ. अरूणा शर्मा ने हाल ही में जारी अपने एक आलेख में कहा है कि भारत में महिलाओं की आबादी 68.5 करोड़ है और उनकी संख्या 1.7 प्रतिशत की गति से आगे बढ़ रही है। इसके बावजूद देश की जीडीपी में स्त्रियों का योगदान केवल 17 प्रतिशत है, जो वैश्विक औसत का आधा ही है। अगर इस 17 प्रतिशत के आंकड़े को बढ़ाकर 50 प्रतिशत ले जाया जाए तो इससे देश की जीडीपी में 1.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी और उसे 9 प्रतिशत की टिकाऊ दर पर ले जायेगी।

उन्होंने आगे कहा है कामकाजी महिलाओं को केवल कल्याणकारी सौगातें देना ही काफी नहीं, उनका कौशल विकास भी करना होगा। उन्हें वर्क फोर्स में शामिल होने के योग्य बनाना होगा, ताकि वे अस्मितापूर्वक अपनी आजीविका कमा सके। उन्होंने यह भी कहा देश को न केवल स्त्रियों के स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा, कौशल विकास पर ध्यान केन्द्रित करना होगा बल्कि उन्हें संगठित – असंगठित क्षेत्र में वर्क फोर्स का हिस्सा बनने के लिए भी प्रेरित करना होगा। उनकी बातों में वजन है और महत्वपूर्ण भी है। इस पर गंभीरतापूर्वक विचार कर लागू किया जाना चाहिए।

इसलिए देश में शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के बेरोजगारों को रोजगार देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जाना अत्यन्त आवश्यक है। आज केन्द्र शासन के सभी विभागों में लाखों रिक्त पद हैं। इसी प्रकार देश के सभी राज्यों में भी यही हालत है। केन्द्रीय विश्वविद्यालय हो या राज्य शासन के विश्वविद्यालय सभी में रिक्त पदों की भरमार है। यही हाल स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी है। केवल केन्द्र और राज्यों के समस्त विभागों में रिक्त पदों की ही पूर्ति कर दी जाए तो बेरोजगारी काफी हद तक कम की जा सकती है। इसी प्रकार मनरेगा में आवंटन की कटौती की बजाय, आवंटन की बढो़तरी की आवश्यकता है।

इसे केन्द्र शासन और राज्य शासन को समझना होगा, तभी इस बेरोजबारी की समस्या का निराकरण हो सकेगा अन्यथा इसी प्रकार केन्द्र और राज्य सरकारें मुफ्त सौगातें देती रहेगी तो उससे स्थाई रूप से कुछ होने वाला नहीं !

संपादक- कमलगिरी गोस्वामी

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