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Sach Ke Sath

जिले के राजनीतिक समीकरण क्या कहते हैं…..?

धार जिले की सात विधानसभा सीटों में से दो पर भाजपा, दो पर कांग्रेस, शेष तीन सीटों पर कांटे का मुकाबला।

राजनीति में स्थायी दोस्त और दुश्मन नहीं होते हैं, चुनाव तो होते रहते हैं, हार जीत भी तय होती हैं, किन्तु आपसी तनाव न रखते हुए भाईचारा, मानवता को बनाएं रखे।

धार। (राकेश साहू) राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों का भाग्य ईवीएम मतपेटियों में बंद हैं, आगामी 3 दिसंबर को मतगणना होगी। कौन जीतेगा, कौन हारेगा, हार जीत के कारण क्या रहेंगे, विधानसभा चुनाव में क्या कोई लहर थी, या कोई विशेष मुद्दों को लेकर मतदाताओं ने अपना मत किसको दिया होगा? राजनीतिक विश्लेषकों ने कयास लगाए हैं, मतदाता ख़ामोश रहा है उसे पहचानने की कोशिश की गई।
आपको बता दें कि धार विधानसभा चुनाव में चतुष्कोणीय मुकाबला देखने को मिला। किंतु भाजपा, कांग्रेस में सीधी टक्कर देखने को मिली है। विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी घोषित होते ही मतदाताओं ने अपना मन बना लिया था कि वोट किसको देना है। उसके बाद मतदाता पूरी तरह से ख़ामोश रहा। मतदाता के ऊपर न तो कोई चुनाव प्रचार का असर हुआ और न ही किसी प्रकार के प्रलोभन के चक्कर में भी मतदाता नहीं आया। मतदाता ने विकास को चुना और सर्वश्रेष्ठ जनप्रतिनिधि को चुनने का मन बना लिया था। ऐसा लगता हैं कि निर्दलीय प्रत्याशियों को मतदाताओं ने सिरे से खारिज कर दिया। निर्दलीय प्रत्याशियों को उनके खास, अंध भक्त समर्थकों के मत ही प्राप्त हुए हैं। जिससे ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि निर्दलीय प्रत्याशियों को ज्यादा मत नहीं मिले हैं सिर्फ़ उनके खास समर्थकों के वोट ही मुश्किल से मिले हैं। निर्दलीय प्रत्याशी राजीव यादव को धार नगर पालिका के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष सहित कुल मिलाकर 11 पार्षदों का समर्थन मिला। किन्तु वार्ड के मतदाताओं ने निर्दलीय प्रत्याशी को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने अपना वोट पार्टी सिंबल को दिया है। इसी प्रकार अन्य क्षेत्रों में भी निर्दलीय प्रत्याशियों को खारिज कर दिया है। इसी प्रकार निर्दलीय प्रत्याशी कुलदीप सिंह बुंदेला के पारिवारिक संबंध, और उनके खास समर्थकों ने ही उन्हें वोट दिया है। आम जनता ने निर्दलीय प्रत्याशियों को ज्यादा पसंद नहीं किया है। जिससे ऐसा अनुमान लगाया गया है कि धार विधानसभा में 8 से 10 हजार वोट के अंदर ही निर्दलीय प्रत्याशी सिमटकर रह गए हैं। एक निर्दलीय भाजपा का और एक निर्दलीय कांग्रेस का होने से मुकाबला बराबर हो गया। अब सीधी टक्कर भाजपा व कांग्रेस के उम्मीदवार के बीच दिखाई दे रही हैं। वर्ष 2018 के चुनावो में भाजपा व कांग्रेस के मतदाताओं ने यथावत मतदान किया है। युवा व नए मतदाताओ ने परिवार की विचारधारा के अनुसार ही मतदान किया।

वर्ष 2023 के चुनावो में जो मतदान का प्रतिशत बढ़ा हुआ है। उसे लाडली बहना योजना का प्रभाव समझा जाय या बदलाव की लहर के रूप में देखा जाए। राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान हैं कि बढ़ा हुआ मतदान का प्रतिशत लाडली बहना योजना के रूप में दिखाई दे रहा है जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि भाजपा को इसका सीधा लाभ मिल सकता है। वहीं देखा जाए तो निर्दलीय प्रत्याशी राजीव यादव अगर 15 हजार वोट लाने में सफल हो गए तो भाजपा का नुकसान होगा और कांग्रेस के उम्मीदवार को लाभ होगा।

विधानसभा धरमपुरी

धार जिले की धरमपुरी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के प्रत्याशी कालुसिंह ठाकुर बढ़त बनाए हुए हैं और कांग्रेस के उम्मीदवार पांचीलाल मेढा को कांग्रेस की निर्दलीय प्रत्याशी श्रीमती राजू बाई चौहान नुकसान पंहुचा रही हैं। कांग्रेस का वोट बैंक दो भागों में बंट गया है। जिससे धरमपुरी विधानसभा सीट भाजपा के खाते में स्पष्ट रूप से जाते दिखाईं दे रही हैं।

मनावर विधानसभा

इसी प्रकार मनावर विधानसभा सीट से भाजपा के युवा प्रत्याशी शिवराम कन्नौज के समर्थको की संख्या अधिक है। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनावों में शिवराम कन्नौज के पिता स्व श्री गोपाल कन्नौज निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लगभग 30- 32 हज़ार से अधिक वोट लाने में सफल हुए थे। वर्ष 2023 के चुनाव में आप प्रत्याशी जो जयस के समर्थक भी माने जाते हैं जो कांग्रेस के वोट बैंक का विभाजन कर रहे हैं। कांग्रेस प्रत्याशी डॉ हीरालाल अलावा को इस बार जयस का साथ नहीं मिलने से नुकसान उठाना पड़ रहा है। जिससे अनुमान लगाया गया है कि मनावर विधानसभा सीट को भाजपा जीतने में सफल होगी।

कुक्षी विधानसभा

कुक्षी विधानसभा सीट पर कांग्रेस के सुरेन्द्र सिंह हनी बघेल ने कब्जा जमाकर रखा हुआ है और मतदाताओं के बीच खासे लोकप्रिय युवा उम्मीदवार हैं जो अपने सहज, सरल, स्वभाव के कारण आम आदमी उन्हे पसंद करता है और पिछले 2018 के विधानसभा चुनावों में 62 हजार वोटों की लीड बनाकर रखी हुई थी। भाजपा के युवा उम्मीदवार जयदीप पटेल भी आम जनता के बीच लोकप्रिय युवा नेता हैं। जो कांग्रेस के प्रत्याशी को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। किन्तु 62 हज़ार वोटो की लीड को पाटना आसान नहीं होगा। लीड को कम कर सकते हैं किन्तु कांग्रेस प्रत्याशी की जीत को रोक नहीं सकते। कांग्रेस की जीत सुनिश्चित दिखाई दे रही हैं।

गंधवानी विधानसभा

गंधवानी विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के सरदार सिंह मेढा और कांग्रेस के युवा दिग्गज नेता उमंग सिंगार के बीच मुकाबला है। जिसमें कांग्रेस प्रत्याशी उमंग सिंगार का पलड़ा भारी दिखाई दे रहा है। हालांकि उमंग सिंगार के साथ विवाद जुड़े रहे जिससे उनकी छवि पर विपरीत प्रभाव भी पड़ा है। किन्तु गंधवानी विधानसभा क्षेत्र में उमंग सिंगार की पकड़ मतदाताओं के बीच बनी हुई हैं जिसका लाभ उन्हे मिलता दिखाई दे रहा है। यह गंधवानी विधानसभा सीट कांग्रेस की झोली में दिखाई दे रही है। फिर भी भाजपा प्रत्याशी ने कड़ी टक्कर चुनावों में पेश कर दी है। देखना होगा ऊंट किस करवट बैठता है।

बदनावर विधानसभा

बदनावर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के प्रत्याशी राजवर्धन सिंह दत्तीगांव व कांग्रेस के उम्मीदवार भंवर सिंह शेखावत हैं। दोनों प्रत्याशी मज़बूत होकर कड़ी टक्कर एकदुसरे को दे रहे हैं। बदनावर विधानसभा सीट से हमेशा स्थानीय उम्मीदवार की मांग उठती रही हैं। इस मुद्दे को लेकर भाजपा के प्रत्याशी को लाभ मिला है और जातिगत समीकरण राजपूत, पाटीदार समाज का बाहुल्य क्षेत्र माना जाता है। भाजपा कार्यकर्ताओ में असंतोष न हो और भीतरघात नही हुआ तो इस लिहाज़ से भाजपा के प्रत्याशी राजवर्धन सिंह दत्तीगांव का पलड़ा भारी दिखाई दे रहा है। फिर भी कहा नही जा सकता कि बाबू जी राम राम ऊंट किस करवट बैठ जाय।

सरदारपुर विधानसभा

सरदारपुर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के प्रत्याशी वेल सिंह भूरिया हैं तो कांग्रेस के प्रताप ग्रेवाल उम्मीदवार हैं। इन दोनों प्रत्याशियों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा हैं। सरदारपुर विधानसभा क्षेत्र में अनुमान लगाना मुश्किल हो रहा है। सरदारपुर विधानसभा क्षेत्र अंदरूनी ग्रामीण इलाकों में बसा हुआ है और मझरे, टोले अंदरूनी इलाके हैं और जातिगत भील भिलाला समीकरण के अलावा व्यक्तिगत पहचान रूबरू या डोर टू डोर जो पहुंच सका है। वह जीतने में कामयाब हुआ है और सरदारपुर विधानसभा क्षेत्र में नगरीय सामान्य इलाके दसई, राजोद, लाबरिया, बरमंडल आदि क्षेत्रों में कांग्रेस प्रत्याशी मज़बूत दिखाई दिए हैं। प्रताप सर का कार्य व्यवहार आम पब्लिक में संतोषजनक रहा है। साथ ही सरदारपुर का इतिहास रहा है कि मतदाता हर बार उम्मीदवार को बदल देता हैं। दोनों ही उम्मीदवारों के बीच कड़ी स्पर्धा हैं, सर्वे रिपोर्ट में ग्रामीण इलाकों में भाजपा की अच्छी पकड़ बताई गई हैं तो वही सामान्य नगरीय इलाकों में कांग्रेस मजबूत दिखाई दे रही हैं। कहना मुश्किल है कौन जीतेगा? कांटे का मुकाबला है। अब देखना होगा कि इस बार राजनीति में ऊंट किस करवट बैठेगा?

प्रधान संपादक- कमलगिरी गोस्वामी

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